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सरकारों का नाकारापन: यहाँ बुखार की गोली के लिए भी लगानी पड़ती है 42 किमी की दौड़

रेफर सेंटर बनकर रह गए सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र

Story Highlights
  • जखोली में फिजिशियन, रेडियोलाॅजिस्ट, सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, पैथोलाॅजिस्ट,निश्चेतक जैसे 53 पद रिक्त
  • जखोली में सर्जन, लैब टैक्नीशियन, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, महिला सर्जन जैसे 29 पद रिक्त
  • अगत्यमुनि में महिला स्वास्थ्य कार्यकत्री के 8 पद भी रिक्त
  • अगस्त्यमुनि में रेडियोलाॅजिस्ट, सर्जन, निश्चेतक, बाल रोग विशेषज्ञ, फिजिशियन, एक्सरे तकनीशियन, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, लैब टैक्नीशियन जैसे 41 जरूरी पद रिक्त
रिपोर्ट: कुलदीप राणा/रुद्रप्रयाग
उत्तराखण्ड राज्य की परिकल्पना जिन उद्देश्यों के साथ की गई थी 18 साल बाद भी वो साकार होती नजर नहीं आ रही है। बुखार की गोली के लिए अगर 42 किमी की दौड़ आज भी लगानी पड़ रही हो तो इसे हमारी सरकारों की नाकामी न कहें तो और क्या कहें। 
देश-विदेश के तीर्थाटनों और पर्यटकों से वर्ष-भर गुलजार रहने वाले तथा आपदा की दृष्टि से अति संवेदनशील जनपद रुद्रप्रयाग की स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह से हाशिए पर नजर आ रही हैं। तीनों विकासखण्ड खण्डों में अधिकांशतः सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र संसाधनों और डाॅक्टरों के अभाव में रेफर सेंटर बने हुए हैं तो कई दूर-दूर तक भी स्वास्थ की सुविधा नहीं है। रुद्रप्रयाग जसोली के दो दर्जन गाँवों के लोगों को बुखार आने पर 42 किमी रुद्रप्रयाग अथवा कर्णप्रयाग की दौड़ लगानी पड़ती है। कई बार गम्भीर बीमार होने कइ लोग रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। कोटतल्ला, बिजरा कोट, कोटमल्ला जैसे गांवों तक यातायात की सुविधा भी नहीं है। हालांकि सड़क की कटिंग तो हो रखी है लेकिन वर्षों से डामरीकरण न होने के कारण यह मार्ग खतरनाक बना हुआ है। ऐसे में गर्भवती महिलाओं बीमारों को अस्पताल तक पहुँचने में बड़ी कठिनाईयों का सामना करना पड़ता है।
पहाड़ों में स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने के भले ही सरकार ढोल क्यों न पीटती हो और नेता मंत्री हर जनसभाओं में यहां की स्वास्थ्य की सेहत सुधारने की बात करती हो लेकिन जो स्थिति है वह चौकाने वाली है। पहले बात कर लेते हैं रुद्रप्रयाग जनपद के विकासखण्ड जखोली की। 

सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र जखोली आज मात्र रेफर सेंटर के रूप में विख्यात है। इसका कारण ये है कि जखोली में स्वीकृत 61 पदों के सापेक्ष केवल 8 पदों पर ही तैनाती है। यानी की 53 पद यहां रिक्त चल रहे हैं। फिजिशियन, रेडियोलाॅजिस्ट, सर्जन, बाल रोग विशेषज्ञ, स्त्री रोग विशेषज्ञ, पैथोलाॅजिस्ट,निश्चेतक जैसे पदों पर तैनाती करना सरकारें वर्षों पहले भूल गई थी, लेकिन सरकारों की यह चेतना आज भी नहीं लौट पाई है। ऐसे में किस तरह यह केन्द्र तिमरदारों को स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया करवा रहा होगा यह तो सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है।                                               
अब जरा अगस्त्यमुनि सामुदायिक स्वास्थ्य केन्द्र स्थिति भी सुन लिजिए। यहां रेडियोलाॅजिस्ट, सर्जन, निश्चेतक, बाल रोग विशेषज्ञ, फिजिशियन, एक्सरे तकनीशियन, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, लैब टैक्नीशियन जैसे जरूरी पद रिक्त चल रहे हैं। अगर चिकित्साधिकारियों, पैरामेडिकल स्टाॅफ की बात की जाय तो स्वीकृति 72 पदों के सापेक्ष 31 पदो पर ही यहां तैनाती है। विकासखण्ड अगत्यमुनि में महिला स्वास्थ्य कार्यकत्री के 8 पद भी रिक्त चल रहे हैं। उधर प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र उखीमठ भी बीमार पड़ा हुआ है। यहां भी स्वीकृत 50 पदों के सापेक्ष 21 पर ही तैनाती है लेकिन महत्वपूर्ण सर्जन, लैब टैक्नीशियन, खाद्य सुरक्षा अधिकारी, महिला सर्जन जैसे पद यहां भी रिक्त चल रहे हैं। 
पहाड़ों में हमेशा से स्वास्थ्य सेवाएं लचर रहीं हैं, लेकिन इस ओर सरकारों ने जरा भी संजीदगी नहीं दिखाई। यही कारण है कि आज लोग बुनियादी सुविधाओं के लिए पहाड़ छोड़ रहे हैं और पहाड़ के गाँव वीरान और खण्डहरों में तब्दील होते जा रहे हैं। यह स्थिति हमारी सरकारों के 18 साल की घोर नाकरापन को दर्शा रही है।
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