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मोदी सरकार के मास्टरस्ट्रोक माने जा रहे सामान्य वर्ग को आरक्षण की राह इतनी आसान नही!

सुप्रीम कोर्ट इन आधारों पर लगा सकता है रोक

नई दिल्ली: मोदी सरकार द्वारा सरकारी नौकरियों और एजुकेशन में सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 फीसदी आरक्षण देने का मास्टरस्ट्रोक तो खेल दिया है, लेकिन पिछले वर्षों का इतिहास देखें तो लगता नहीं कि यह इतनी आसानी से आगे बढ़ पाएगा. इसके रास्ते में सबसे बड़ी अड़चन सुप्रीम कोर्ट बन सकता है, जिसके ऊपर यह जिम्मेदारी है कि कोई भी कानून या संशोधन संविधान की मूल भावना के खिलाफ न हों.

असल में इसके पहले जब भी सरकारों ने आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश की, तो सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसलों से इन पर रोक लगा दी थी. इंदिरा साहनी एवं अन्य बनाम केंद्र सरकार (यूनियन ऑफ इंडिया) में सर्वोच्च न्यायालय (AIR) 1993 SC 477: 1992 Supp (3)SCC 217 ने केंद्रीय सरकारी नौकरियों में अन्य पिछड़े वर्गों के लिए अलग से आरक्षण लागू करने को सही ठहराया था.

इकोनॉमिक टाइम्स के अनुसार, इसी केस में कोर्ट ने कहा था कि इस तरह का आरक्षण सिर्फ गरीबी के आधार पर नहीं हो सकता और इसके लिए सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़ा होना भी जरूरी है और यह पिछड़ापन कई पीढियों के साथ हुए अन्याय के रूप में दिखना चाहिए. इंदिरा साहनी निर्णय को मंडल कमीशन केस के नाम भी जाना जाता है. इसमें सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच ने संविधान सभा में दिए गए डॉ. आंबेडकर के वक्तव्य के आधार पर सामाजिक बराबरी और अवसरों की समानता को सर्वोपरि बताया था.

एक दूसरी अड़चन है आरक्षण के लिए तय 50 फीसदी की तय सीमा. सुप्रीम कोर्ट अपने कई फैसलों में कह चुका है कि इसका उल्लंघन समानता के अधिकार के बारे में संविधान के अनुच्छेद 14 में निर्धारित प्रावधान के खिलाफ जाता है.  इसके पहले कई राज्य सरकारें कुछ वर्गों जैसे जाट, मराठा, मुस्लिम आदि के गरीबों को आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की कोशिश कर चुकी हैं, लेकिन इसी 50 फीसदी की सीमा के उल्लंघन की वजह से भी उन पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी थी.

यही नहीं, कई राज्य सरकारों ने इन प्रावधानों को चुपचाप नौवीं अनुसूची में डालकर लागू करने की कोशिश की थी, ताकि इस पर कोर्ट की समीक्षा की जरूरत न रह जाए. लेकिन कोर्ट ने इन्हें भी रोकते हुए कहा था कि नौंवी अनुसूची में भी ऐसे किसी भी कानून को नहीं रखा जा सकता, जिससे संविधान के मूल ढांचे का उल्लंघन होता हो. 1973 में केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायाधीशों की पीठ ने अपने संवैधानिक रुख में संशोधन करते हुए कहा कि संविधान संशोधन के अधिकार पर एकमात्र प्रतिबंध यह है कि इसके माध्यम से संविधान के मूल ढांचे को क्षति नहीं पहुंचनी चाहिए. अपने तमाम अंतर्विरोधों के बावजूद यह सिद्धांत अभी भी कायम है और जल्दबाजी में किए जाने वाले संशोधनों पर अंकुश के रूप में कार्य कर रहा है.

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