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सुर्ख़ फूल देख लगता है प्रकृति भी तैयार है होली खेलने

होली में नए अन्न का का भोग लगाकर करते है नई उपज का स्वागत

यूसुफ पठान.दमोह रंगों के त्योहार होली की तैयारी पूरी हो चुकी है। वहीं दूसरी ओर प्रकृति भी इन दिनों ऐसी प्रतीत हो रही है, मानो पेड़ पौधों पर खिले रंग बिरंगे फूल होली खेलने को बेताब हों। जंगल में स्यामर के सूखे पेड़ों में लाल, पीले कोपलें और टेसू के सुर्ख लाल फूल होली की आमद का संदेश दे रहे हैं। दूसरी ओर रबी की उपज खेतों में पककर सोने के रंग में लहलहा रही है।
बुंदेलखंड इलाके में फागुन के महीने में गांव की चौपालों में फाग की अनोखी महफिलें जमने लगी हैं। जिनमें रंगों की बौछार के बीच गुलाल-अबीर से सने चेहरों वाले फगुआरों के होली गीत माहौल को और भी खुशनुमा बना रहे हैं। फाग के बोल सुनकर बच्चे, जवान व वृद्ध, पुरुष महिलाएं झूम उठते हंै। सुबह हो या शाम गांव की चौपालों में फाग की महफिलें सजीं हुईं हैं।

इसलिए मनाते हैं फाग

यह त्योहार बुराई को खत्म करने का सांकेतिक संकल्प है। होलिका दहन की आग को लोग आपने घरों में गोबर के बरूला जलाकर ले जाते हैं। बरूला पर अनाज पका कर साल भर घर में समृद्धि और संपन्नता की कामना की जाती है। और इन बरूलों पर भोजन पकाकर सब मिलजुलकर पेट भरते हैं। कहते हैं कि होलिका के दहन पर भगवान के भक्तों ने वहीं राख एक दूसरे पर डालकर खुशियां मनाई थी। इसीलिए होली की शुरूआत हुई।

घर-घर बनते हैं गोबर के बरूला

स्थानीय निवासी डॉ. रामगोपाल सोनी बताते है कि फागुन मास में होली के पहले ग्रामीण महिलाएं घर-घर गोबर से छोटे कंडे जिन्हे बरूला नाम से जाना जाता है, उसे बनाकर रखती हैं। इन्हें होली के साथ जलाने के अलावा विषम सख्या में जैसे 7,9,11 एकत्र करके घर में जलाते हंै। उसी की आग में भोजन पकाकर खाते हैं। ऐसा सनातन काल से चला आ रहा है। इसके फायदे भी हैं। सूखे गोबर में वेक्टेरिया से लडऩे की क्षमता है। इसे घर में जलाने से विभिन्न कीटों का नाश हो जाता है। उन्होंने बताया होली में जलाए बरूला की आग लोग अपने अपने घर ले आते हंै जिस आग को घर के चूल्हे में जला कर विधि विधान से नई आग का स्वागत कर पूजा होती है। पहले इस आग को लोग वर्ष भर बुझने नहीं देते थे, लेकिन अब यह संभव नहीं है। पहले महिलाएं खाना पकाने के बाद कंडे की आग को चूल्हे में ही राख में दवा कर रख देती थीं। वह आग सुबह तक कंडे में जलती थी। सुबह उसी आग में अन्य कंडे व लकड़ी जलाकर खाना पकाया जाता था। आज भी कई गांवों में यही प्रणाली अपनाई जाती है।

पाठा गांव निवासी बद्री कुड़ेरिया का कहना है कि फाग मौज मस्ती के साथ एक दूसरे के गिले शिकवे दूर कर मेल मिलाप का त्योहार है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कीचड़ और गोबर से फाग होती है। हालांकि अब रंग का अधिक उपयोग होने लगा है। फाग की शुरूआत भगवान श्रीकृष्ण के समय से हुई थी। होली के साथ राई और उड़द को जलाकर प्रेत बाधा को भी समाप्त किया जाता है। यह सीजन नए अन्न आने का होता है। जिसमें किसान नए अन्न जैसे गेहूं की बलियां और चने को होली के साथ भोग लगाकर नए अन्न का स्वागत करते हंै।

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