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सुशांत केस में रिया चक्रवर्ती और शौविक की जमानत याचिका पर बोम्बे हाईकोर्ट में सुनवाई आज

मुंबईः ड्रग्स केस में फंसी रिया चक्रवर्ती और उनके भाई शौविक चक्रवर्ती की जमानत याचिका पर कोर्ट में सुनवाई चल रही है और उनकी जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान कोर्ट पहले एनडीपीएस एक्ट के सेक्शन 37 पर गौर कर रही है क्योंकि वह भी एक बड़ा आधार था जिसके आधार पर निचली अदालतों से जमानत नहीं मिली थी.

धारा 37 कहती है कि अगर जांच एजेंसी इस धारा के तहत किसी को जमानत न देने की मांग करती है तो निचली अदालतों को जांच एजेंसी उसकी बातों को और ज्यादा गंभीरता से लेना पड़ेगा जब तक डालते हैं इस बात को लेकर संतुष्ट नहीं हो जाती कि आरोपी के ऊपर लगाए गए आरोप पूरी तरह से बेबुनियाद है तब तक जमानत नहीं दी जा सकती.

बासित परिहार के वकील अदालत में अपनी दलीलें पेश कर रहे हैं और पहली याचिका बासित की ही है. रिया की 4 और शौविक कि 5 है. लेकिन सभी मामलों की सुनवाई एक साथ ही होगी. एक के बाद एक वकील दलील पेश करेंगे. ऐसे सभी धाराओं में जहां पर सजा 1 साल तक की होती है उन मामलों को बेलेबल ऑफेंस की श्रेणी में रखा जाता है. बासित परिहार का मामला भी उसी श्रेणी का है.

रिया के वकील ने भी अपनी दलीलें पेश करनी शुरू की और कहा कि अगर बरामदगी छोटी है तो ऐसे मामलों में ज़मानत दी जानी चाहिए. रिया के वकील ने कहा कि किसी भी मामले में सजा और धारा इस आधार पर तय होनी चाहिए कि आरोपी के खिलाफ क्या सबूत मिले हैं और एनडीपीएस एक्ट में तो ड्रग की क्वांटिटी का काफी महत्वपूर्ण जिक्र किया गया.

रिया के वकील का कहना है कि एनडीपीएस एक्ट की धारा 37 उन्हीं मामलों में महत्वपूर्ण होती है जो वाकई में बहुत ज्यादा गंभीर हो जहां पर बड़ी मात्रा में ड्रग की बरामदगी हुई हो लेकिन यह मामला उनमें से नहीं है.

इस सबके बीच कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर धारा 37 नहीं लगती है तो इसका मतलब यह नहीं है कि बाकी धाराओं में कोई गिरफ्तारी जमानती हो जाती है. और उनमें जमानत दी जा सकती है. एनसीबी के वकील ने सुनवाई के दौरान कहा है कि एनडीपीएस एक्ट के अधिकतर मामलों में जमानत बिना पुख्ता आधार के नहीं दी जानी चाहिए. एनसीबी के वकील ने कहा कि जिस तरीके की दलीलें धारा 37 को लेकर रिया के वकील ने दी है वह ठीक नहीं है. एनसीबी के वकील ने कहा कि एनडीपीएस एक्ट के तहत हुए सभी अपराध गैर जमानती है. एनसीबी के वकील ने कहा की एनडीपीएस एक्ट के प्रावधान सीआरपीसी के प्रावधानों से अलग हैं. लिहाज़ा उनको अलग ही देखा जाना चाहिए.

इस बीच मिरांडा के वकील ने कहा कि रिया के वकील जो दलील दे रहे हैं उनकी भी वही दलीलें हैं. हत्या के मामले में सिर्फ एक परिवार पर उसका असर पड़ता है लेकिन ड्रग के मामलों में पूरा समाज बर्बाद होता है. सबके बीच कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि पहले तो यही महत्वपूर्ण हो जाता है कि अगर धारा 37 के तहत ही अपराध आता है तो सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के फैसले के मुताबिक तो वह वैसे ही गैर जमानती हो जाता है.

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